Friday, 28 September 2012

जो पैसा देगा, राजनीति उसी के हिसाब से चलेगी

निर्वाचन आयोग के आंकड़ों के मुताबिक भारत में कारोबार कर रही कंपनियों ने बीते पांच सालों में देश के छह बड़े राजनीतिक दलों (भाजपा, कांग्रेस, बसपा, सपा, माकपा और राकांपा) को 4,400 करोड़ रुपए से ज्यादा का चंदा दिया है।

सबसे खतरनाक बात यह है कि कोई भी पार्टी चंदा देने वाली कंपनियों का खुलासा करने को तैयार नहीं है।
 कांग्रेस केंद्र के साथ ही कई अहम राज्यों की सत्ता संभाल रही है, लिहाजा इस पार्टी पर कारोबारियों ने 1,660 करोड़ रुपए की बारिश की है। गौर करने वाली बात यह है कि अपने को किसान-मजदूरों की पार्टी बताने वाली माकपा को 335 करोड़ रुपए चंदे के रूप में मिले हैं।

 गुप्त चंदा देकर अप्रत्यक्ष तौर पर देश चलाने की इस दौड़ में नैतिक मानदंडों पर चलने की बात करने वाले टाटा समूह से लेकर मुनाफे के लिए कानूनों का उल्लंघन करने के लिए बदनाम स्टरलाइट इंडस्ट्रीज (अनिल अग्रवाल के वेदांता समूह की कंपनी) तक शामिल हैं।

 जब कारोबारी छह बड़े राजनीतिक दलों को पैसा दे रहे हैं तो जाहिर-सी बात है कि कोई भी सरकार आए, पैसेवालों की सेहत पर कोई असर नहीं पड़ने वाला है। यह एक तरह से लोकतंत्र की नीलामी है

 अकेली वालमार्ट ने ही महज दो साल के भीतर भारत में लॉबिंग के लिए बावन करोड़ रुपए फूंक दिए हैं और इसका जिक्र अमेरिका में दिए गए खुलासा-बयान में वालमार्ट ने किया है।

वाणिज्यमंत्री आनंद शर्मा तो बहुब्रांड खुदरा में विदेशी निवेश के मसले पर इतने आक्रामक हो गए हैं कि अब भ्रम होने लगा है कि वह भारत की जनता के प्रतिनिधि हैं या वालमार्ट के प्रवक्ता।

भारतीय वायुसेना ने जब पिछले दिनों फ्रांस की कंपनी राफेल से 75,000 करोड़ रुपए में लड़ाकू विमान खरीदने का सौदा किया तो ब्रिटेन की संसद में जमकर हंगामा हुआ। सांसदों का कहना था कि ब्रिटेन की सरकार भारत को ढाई सौ करोड़ पौंड की सालाना रकम ‘विकास’ के लिए देती है, ऐसे में भारत ने लड़ाकू विमानों की आपूर्ति के लिए ब्रिटिश कंपनी टाइफून को छोड़ कर फ्रांस की कंपनी राफेल का चुनाव क्यों किया। यानी कथित विकास के लिए दी जाने वाली रकम का असली मकसद ब्रिटिश कंपनियों के मार्ग में आने वाली अड़चनों को साफ करना है। कहने की जरूरत नहीं कि फ्रांस ने लॉबिंग और दलाली पर इस दफा ज्यादा रकम खर्च की, लिहाजा फ्रांस की कंपनी राफेल यह सौदा हासिल करने में कामयाब रही।

 ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल का कहना है कि केवल अमेरिका की कंपनियां दुनिया भर में हर माह 1,243 करोड़ रुपए चंदे और लॉबिंग पर खर्च कर रही हैं और भारत इन कंपनियों के निशाने पर सबसे ऊपर है। बहस लंबी है, मगर संदेश साफ है कि जो पैसा लेगा उसे लूट में साझीदार बनने के लिए जायज-नाजायज काम भी करना होगा, चाहे उसकी पार्टी के झंडे का रंग कैसा भी हो। याद रहे, भीष्म पितामह ने गलत आदमी का नमक खाने की कीमत ताजिंदगी चुकाई थी।
 
By - अरविंद कुमार सेन
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