Monday, 24 September 2012

क्या FDI से देश का भला हो सकता है (video) ?









1-2 साल पहले लिखा लेख -
         स्वदेशी सामानो की जब भी मैं बात करता हूँ तब पहली बार सुनने वाले की अचानक सा झटका लगता है और सामने वाला बोलता है कि क्या फालतु की बाते कर रहे हो । कुछ समय पहले मेरी भी स्थिति आपके ही तरह थी । मैं तो सुनने के लिये भी राजी नही था । परन्तु अब मुझे काफी नई जानकारीयाँ प्राप्त हुई है । काफी सारा झूट सामने आ गया है जो की मेरे दिमाग में ड़ाल दिया गया था ।

झूट और सत्य ,
(१) झूट - आप कुछ सामान ही विदेशी खरीदते हो और विदेशी कंपनियाँ काफी कम है
सत्य -> ये बिल्कुल असत्य है । आप सुबह से शाम तक विदेशी सामान ही खरीदते हो , जैसे कोलगेट से लेकर लक्स , लाईफबोय से लेकर लिरिल , पेप्सी से लेकर कोला , आलु चिप्स से ब्रुक ब्रान्ड या ताजमहल चाय या अन्पूर्णा नमक, ये सब विदेशी है । विदेशी सामानो की लिस्ट बहुत बडी है । विदेशी कंपनियों ने पूरी तरह से अर्थ व्यवस्था को नियंत्रण कर रखा है । विदेशी कंपनियाँ एकाधिकार सिद्धान्त पर कार्य करती है । आज भारत में ४००० से भी ज्यादा विदेशी कंपनियाँ है ।

(२) झूट - विदेशी कंपनियाँ पूँजी लाती है
सत्य -> यह आधा सत्य है । विदेशी कंपनियाँ पहले साल ही पूँजी लगाती है और उसके बाद हर साल काफी गुना पैसा बना कर ले जाती है । जैसे पेप्सी कोला , HUL

(३) झूट - विदेशी कंपनियाँ Technology तकनीक लाती है
सत्य -> ये बिल्कुल असत्य है । ९०% प्रतिशत कंपनियाँ भारत में दैनिक जरूरतो का सामान बेचती है । जिसको कि शून्य तकनीक कहा जा सकता है । जैसे की नमक, चिप्स, चाय, पेप्सी कोला । तकनीक का क्षेत्र होता है युद्ध के अस्त्र, मिशाइल, सेटेलाईट , सुपर कम्पुटर , इन सभी क्षेत्रों में भारत ने विदेशो से काफी भीख माँगी थी पर सभी ने साफ मना कर दिया था , अंत में हार कर भारतीय वैज्ञानिको ने भारत सरकार से ये सब निर्माण करने के लिये सहायता माँगी तब हमारे यहाँ इन तकनीको का विकास हुआ ।

(४) झूट - विदेशी कंपनियाँ भारत में नई प्रोडक्ट लाती है
सत्य -> ये बिल्कुल असत्य है । भारत को दुनिया के देश ड़ंपिंग ग्राउन्ड (dumping ground) देश की तरह मानते है । उनके वहाँ के बेकार प्रोडक्ट को भारत में आते है । बहुत सारे सामान जैसे रेफ्रीजरेटर, काफी दवाईयाँ, रसायनिक खाद आदि, जो की उनके वहाँ के देश मे वो baan (प्रतिबन्धित) है पर वो भारत में बिकते है । विदेशी कंपनियाँ अपने प्रचार के माध्यम से बेकार से बेकार सामान को भी बेच सकती है ।

(५) झूट - विदेशी कंपनियाँ भारत में सस्ते प्रोडक्ट लाती है
सत्य -> यह आधा सत्य है । भारत की कंपनीयों को ४६ तरह के टैक्स (कर) देने पड़ते है । चाईना जैसे देशो में तो सरकार या बैन्क ३% पर लोन देती है और देश के बाहर जाने वाले सामान पर टैक्स (कर) की विशेष छूट देती है । चाईना में मजदूरी १० रूपये में मिल जाती है । वहाँ तो लेबर कानून नाम की कोई चीज है ही नही । हर देश उसकी कंपनीयों को सहयोग देता है । दुनियाँ की बडी बडी कंपनीयों का मुनाफा और बजट तो भारत के बजट से भी ज्यादा है । ऐसे में भारत की कंपनियाँ कैसे मुकाबला करे ?

(६) झूट - विदेशी कंपनियाँ भारत में प्रतियोगता (competition) बड़ाती है
सत्य -> ये बिल्कुल असत्य है । भारत में पेप्सी कोला ३.५ रूपये से चालु हुई थी क्योंकी उस समय बाज़ार में पेप्सी कोला को टक्कर देने के लिये भारत की कंपनियाँ थी जैसे Limka , Goldspot पर ज़ल्द ही पेप्सी कोला के ईनको अपने मे मिला लिया । और सारे बाज़ार पर monopoly एकाधिकार जमा लिया और वही पेप्सी कोला १० रूपये का हो गया । हर क्षेत्र में ऐसा ही हुआ है । टाटा को HUL ने खरीद लिया , पारले को कोकाकोला ने खरीद लिया , ३० से ज्यादा बड़े भारतीय घराने बिक चुके है । इन्दौर शहर में जब लोगो ने पेप्सी कोला को छोड़ा तो वहाँँ पर अनेको अनेक juise रस बनाने वाले को रोजगार मिला । जो रस का गिलास १० रूपये में मिलता था वो ५ का हो गया पर फिर भी वहाँ के रस बेचने वाले को फायदा हुआ क्योंकि रस खरीदने वालो की संख्या में काफी बड्रोतरी हुई थी । फलो के उत्पादन में भी काफी माँग बडी ।