Thursday, 25 October 2012

क्या भारत मैं हिंदू धर्म खतरे मैं है

क्या भारत मैं हिंदू धर्म खतरे मैं है सुनने मैं विरोधाभास प्रतीत होता है . जिस देश मैं आबादी का अस्सी प्रतिशत हिंदू हो उस देश मैं हिंदू धर्म को कैसा खतरा ? जिसे हज़ार साल की गुलामी नहीं मिटा पाई , जिसे गजनी से औरंगजेब तक की यातनाएं नहीं मिटा पायीं उसे अपने ही राज मैं कैसा खतरा ? प्रश्न जायज़ है इस लिए इसका उत्तर आवश्यक है . स्वतंत्रता के बाद किताबों के स्वरुप को देखिये . १९६५ तक किताबों मैं वाल्मीकि , तुलसीदास , दधिची , राजा मोरध्वज की कहानियां होती थी . सूरदास , मीरा , रसखान इत्यादि की रचनाएँ होती थी . हिंदी भाषा के प्रति समर्पण था .राष्ट्र के प्रति गौरव व अभिमान था . हिंदू त्योहारों पर छुटियाँ होती थी. अब रक्षाबंधन , जन्माष्टमी , राम नवमी की छुट्टियाँ खतम हो गयी . छुट्टी ना होने से त्यौहार मनाना भी बहुत कम हो गया . बसंत पंचमी की जगह वलेंतिने दिवस मानाने की मुहीम कौन चला रहा है ? हमारी आस्था के केन्द्रों की दुर्गति देखिये ? शंकराचार्य को जेल मैं रखा हम चुप रहे . कश्मीरी पंडितों को देश निकाला दे दिया हम चुप रहे . स्वामी रामदेव पर आधी रात पुलिसिया ज़ुल्म धाए गये हम चुप रहे . अयोध्या मैं मुलायम सिंह ने सैकड़ों को गोली से मार दिया हम चुप रहे . अब डीएवी स्कुल भी हिंदू संस्कृति की बातें नहीं पढ़ा सकते . मुसलमान अपनी शिक्षा दे सकता है , सिख दे सकते हैं , ईसाई दे सकते हैं पर सिर्फ हिंदू नहीं दे सकता क्यों? धर्म निरपेक्षता की यह कुत्सित परिभाषा तो संविधान मैं नहीं थी. सन १९७० तक भी ऐसा नहीं था . तो फिर यह सब कैसे हो गया ? रावण को हनुमान या सुग्रीव ने नहीं बल्कि उसके मिथ्याभिमान व लंकावासी विभीषण ने मरवाया था . आज हमारे यहाँ मिथ्याभिमान व विभीषण दोनों प्रचुर मात्र मैं हैं . पहले विभीषण को लें . कौन हमारे समाज मैं घरके भेदी विभीषण हैं . देश का पहला व सबसे खतरनाक विभीषण मिडिया है जो पूर्णतः विदेशियों के कब्जे मैं है .यही सिर्फ मोदी की धज्जी उडाता रहता है और पंडितों के हत्यारों की कोई बात नहीं करता . यही हमारे पतन का मुख्या कारण है . कश्मीर पर कोई दर्द नहीं पर सारा दुःख दर्द गोधरा पर रहता है . दूसरा कारण है कि हिंदू धर्म का यह नया पतन कोंग्रेस के पतन से जुड़ा है. चरण सिंह व अन्य लोगों के कांग्रेस छोड़ने के बाद कांग्रेस मुसलामानों के वोटों कि मोहताज़ हो गयी .उनके एक मुशत वोट देने से धीरे धीरे उनके बिना मांगे हिंदुओं को नीचा दिखाने का कार्यक्रम शुरू हो गया . इसकी शुरुआत हुयी हिंदू त्योहारों की छुट्टी काटने से .अंत मैं अत्याचार का अंत हुआ डॉक्टर करण सिंह की एकता यात्रा से और बाद मैं बीजेपी के उत्थान से . परन्तु मुट्ठी भर मुसलामानों के वोट पर निर्भर अन्य पार्टियों ने बीजेपी को उन्हीं के राज मैं हिजड़ा बना दिया . नीतिश कुमार ने मात्र कमिश्नर के तार पर अयोध्या की सारी गाडियां बंद कर दी और बीजेपी सिर्फ गटबंधन का धर्म निभाती रही. अंत मैं जनता ने ही बीजेपी को गटबंधन से मुक्त कर दिया और वह आज भी सत्ता का रास्ता खोज रही है. अब पछताए क्या होता जब चिड़िया चुग गयी खेत ! परन्तु हिंदू धर्म के साथ हमारा स्वाभिमान , अस्मिता व पूरा अस्तित्व जुडा हुआ है. आज देश मैं किसे स्वाभिमान है , कौन स्वदेशी की बात सोच रहा है , कौन सत्य की रक्षा कर रहा है, कौन गरीबी मैं भी गर्व से मात्र स्वाभिमान की अमानत लिए ढाल लिए खड़ा है जिसे कोई पैसे की तलवार नहीं काट सकती . धर्मनिरपेक्षता की संविधान मैं कोई जरूरत नहीं थी. सेकुलर इंग्लॅण्ड मैं भी ब्लास्फेमी कानून के चलते इसायी धर्म की अवमानना अपराध है . इस एक सेकुलर शब्द ने देश का बहुत नुक्सान किया है और इसे संविधान के संशोधन से हटाने की आवश्यकता है. हिंदू धर्म सर्व धर्म सम मैं विश्वास करता है .पर सिर्फ हिंदू स्कूल मैं शिक्षा नहीं दे सकता बहुत ज्यादिति है . हमारे मंदिरों मैं सरकार का दखल बंद करो. मंदिरों के चढावे का सिर्फ हिंदू धर्म के प्रसार मैं उपयोग करो. मीडिया का हिंदुओं के विरूद्ध छद्म युद्ध पूरी तरह से उजागर करो व मीडिया के डंक से सब की रक्षा करो . अपने श्रेष्ठ होने का मिथ्याभिमान छोडो . नयी पीढ़ी पूरी तरह से हिंदू संस्कृति से अनभिज्ञ है. उसे पुनः धर्म कि मुख्य धारा से जोड़ना आवश्यक है . इस बात को समझ लीजिए कि अपनी खोयी हुयी आस्था हिंदू धर्म के पतन का मुख्या करण बनेगी .इस आस्था के दीप को पुनः प्रज्वलित करना हम सबका कत्र्तव्य है . यदि हम समय रहते नहीं चेते तो ना ही हिंदू धर्म बचेगा ना ये देश .

Friday, 19 October 2012

केजरीवाल का फुसकी बम



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│  नरेन्द्र सिसोदिया
│  स्वदेशी प्रचारक, नई दिल्ली
│  http://narendrasisodiya.com
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केजरीवाल गैंग--वामपंथी षड्यंत्र का सूत्र

 --------- अग्रेषित संदेश ----------
प्रेषक: vikas saini <shrivik*******@gmail.com>



आप लोग गौर करें .....केजरीवाल गैंग ने भाजपा ,कांग्रेस ,शिवसेना आदि लगभग सभी राजनैतिक दलों को आपस में सांठ -गाँठ करके भ्रष्टाचार करने वाला बताया .....लेकिन कम्युनिस्टों --वामपंथियों के खिलाफ एक शब्द भी नहीं कहा ........
सारी दुनिया में पिट चुकने के बाद ..अब भारत में भी ये वामपंथीहाशिये पर धकेले जा चुके हैं ........आजादी से पहले स्वतंत्रता संघर्ष को विफल करने के लिए अंग्रेजों का साथ देते रहे .......
स्वतंत्रता के बाद ..सत्ता में तो नहीं आये लेकिन गद्दार और अय्याश नेहरु की मदद से भारत के शिक्षा ,,इतिहास और पत्रकारिता के संस्थानों पर कब्जा करके बैठ गए ...जी भर के देश के गौरव को कलंकित करके ..आक्रमणकारियों के महिमामंडन का षड्यंत्र सभी स्थानों से रचते रहे .......
1962 में चीन के हमले के समय ये लोग उसके पक्ष में खड़े थे ........कश्मीर के देशद्रोहीयों के पीछे इन्ही की दी हुई जहरीली सोच है .........पंजाब को खून से नहलाने वाले खालिस्तानी आन्दोलन के पीछे कामरेड हरकिशन सिंह सुरजीत का गंदा दिमाग था .....
JNU...जैसे संस्थानों से ये लोग एक से बढ़ कर एक ..गद्दार और देशद्रोही पैदा करते हैं .......इसाई मिशनरियों के साथ मिल कर वनवासियों की आड़ में ये लोग नक्सली आतंकवाद मचाये हुए हैं ......
इन्ही के JNU. के पैदा हुए साँपों ने हिन्दुराष्ट्र नेपाल को बर्बाद करके भारत के विरुद्ध षड्यंत्रों का अड्डा बना दिया है .........ये कभी पाकिस्तान के प्रेम में वाघा बॉर्डर पर मोमबत्ती जलाते हैं ....कभी जेहादी दरिंदों ..जैसे अफजल गुरु की ढाल बन कर खड़े  हो जाते है,,,,,,,,,,,,
इन हिन्दू विरोधियों ने बंगाल और केरल को बांग्लादेशियों और जेहादी आतंकवादियों से भर कर सत्ता के लालच में देश से गद्दारी की है ....
ये हर देशभक्त और हिन्दू मान्यता को गाली देते हैं ...गौमांस की पार्टियों का ऐलान करते हैं ..................
मीडिया में अधिकाँश स्थानों पर इनके तय्यार किये हुए विषेले नाग बैठे हैं ( बरखा दत्त ...राज दीप सर देसाई,,विनोद दुआ ,,प्रणव राय ...आदि )...इसीलिए कभी इनके खिलाफ कोई खबर नहीं उठाई जाती ..........उसी के सहारे इनके षड्यंत्र सिरे चढ़ते हैं .........

केजरीवाल की गैंग में अधिकाँश देशद्रोही कम्युनिस्ट ही भरे पड़े हैं ..गोपाल राय इनका नेता है .....केजरीवाल स्वयं अरुणा राय का चेला है जो की सोनिया गांधी की अध्यक्षता वाली राष्ट्रीय एकता परिषद् की सदस्य है ...इसी संस्था ने हिन्दुओं को गुलाम बनाने वाला एक काला क़ानून बनाया है (लक्षित हिंसा साम्प्रदायिक हिंसा निरोधक क़ानून )उस परिषद् में शहाबुद्दीन जैसे बड़े बड़े गद्दार भरे हैं ...............अन्ना  हजारे और किरण बेदी ने इनके देशद्रोह और गद्दारी के इरादों को पहचान कर अलग होना ही बेहतर समझा ...........

केजरीवाल गैंग के पीछे इन्ही देशद्रोही वामपंथियों की कुटिल सोच काम कर रही है ..जिसके पहले चरण में ये लोग मीडिया के माध्यम से जनता को बरगलाने में लगे हैं की बाकी सारे दल भ्रष्ट हैं,, मिले हुए हैं ,,इसलिए इन कमीनो को चुन लिया जाए ...सत्ता में ना होते हुए भी इन्हें कांग्रेस के कंधे पर बैठ कर मजे लूटने में महारथ हासिल है ..65 सालों का अभ्यास है .....इस समय हर देशभक्त का कर्तव्य है की इन देशद्रोहियों के काले इरादों को पूरी ताकत लगा कर कुचल दें और हिन्दुराष्ट्र का पथ प्रशस्त करें ....वन्देमातरम  

-- Vikas Saini
BLOG
www.hamariaawaaj.blogspot.com


स्वदेशी दीपावली


दीपावली मानने के स्वदेशी तरीके को अपनाकर आप कई घरों को रोशन कर सकते हैं  ...तो यह संकल्प लें ..और दीपावली मनाएं | आज हर स्तर पर विदेशी कंपनियों के माल से लादा जा रहा है उसे  असहयोग और स्वदेशी की भावना से बचाने का प्रयत्न करें  आज के संकल्प के बारे में केवल इतना कहना है की अगर आपको भगवान की मूर्ति जो विदेश में न जाने किस विधि और वस्तु से बनी हो अगर मुफ्त में भी मिले तो कृपया न लें  हमारे कुम्हार भाइयो को समर्थन दें और अगर मूल्य थोडा ज्यादा भी हो तो केवल उन्ही के द्वारा बनायीं गयी मूर्ति लें | हमारे देश के कुटीर उद्योग इस से सुरक्षित रहेंगे और देश का पैसा देश में रहेगा और साथ ही आपकी पूजा पवित्र और सफल रहेगी |

from - BST Mailing List

एक राष्ट्र जो स्वयं अपनी राष्ट्रभाषा से नजरें चुराता है...

---------- अग्रेषित संदेश ----------
प्रेषक: mukesh kajal <sanskareducation.tech@gmail.com>


पिछले दिनों आस्ट्रेलिया की प्रधान मंत्री ने हमारे आत्मसम्मान को ललकारते हुए कहा, 'भारत अंग्रेज शासित देश है।' ऐसा तब हुआ जब एक समिति ने आस्ट्रेलिया - भारत संबंधों को और बेहतर बनाने के लिए सभी राजनयिकों को हिन्दी सीखने का सुझाव दिया। इस सुझाव को वहाँ की प्रधानमंत्री ने अस्वीकार करते हुए उक्त टिप्पणी की। सच ही तो है, जो राष्ट्र स्वयं अपनी राष्ट्रभाषा से नजरें चुराता हैं उसे अपने स्वाभिमान को आहत कर देने वाली ऐसी टिप्पणियों के लिए तैयार रहना चाहिए। यह दुनिया का सबसे बड़ा आश्चर्य है कि स्वतंत्रता प्राप्ति के इतने वर्ष बाद भी हम विदेशी भाषा अंग्रेजी की दासता से मुक्त नहीं हो पा रहे हैं। राजधानी दिल्ली का अधिकतर शासकीय कार्य विदेशी भाषा में होता है।

हर व्यक्ति के लिए आवश्यक ड्राईविंग लाईसंेस पर एक भी शब्द हिन्दी का नहीं। इस सप्ताह हिन्दी, पंजाबी, उर्दू अकादमी तथा साहित्य कला परिषद के संयुक्त तत्वावधान में हो रहे सांस्कृतिक कार्यक्रम के निमंत्रण पत्र में हिन्दी, पंजाबी अथवा उर्दू का एक भी शब्द नहीं। सब अंग्रेजी में होना क्या साबित करता है? क्या स्व-भाषा या राष्ट्रभाषा हिन्दी में कुछ कमी है? सत्य यह है कि हम हीनता-ग्रन्थि के शिकार होकर अनेक भ्रम व पूर्वाग्रहण पाले हुए हैं। आज अंग्रेजी माध्यम के स्कूल लोकप्रिय हो रहे हैं। हमारे बच्चों को हिन्दी में गिनती भी नहीं आती। क्या यह हमारे लिए शर्मनाक बात नहीं है? दरअसल हम भ्रम का शिकार है कि अंग्रेजी अकेली अन्तर्राष्ट्रीय भाषा है जो पूरी दुनिया में समझी व बोली जाती है। सच्चाई यह है कि संयुक्त राष्ट्रसंघ में छह भाषायें चलती हैं। फ्रेंच, अंग्रेजी, रूसी, चीनी, और अरबी।
भारत की कुल जनसंख्या में आधे से अधिक लोग हिन्दी बोलते समझते व लिखते हैं। अन्य विदेशी भाषियों से हिन्दी कई गुना अधिक बड़ी है फिर भी संयुक्त राष्ट्रसंघ ने हिन्दी को स्वीकृति नहीं दी है तो इसका कारण हमारे प्रयासों का खोखलापन है, हिन्दी का नहीं। कितने लोग मानते हैं कि विश्व की अन्तर्राष्ट्रीय डाक भाषा अंग्रेजी नहीं, फ्रेंच है। अंग्रेजी तो अपने देश इंग्लैंड में भी बड़ी मुश्किल से राष्ट्रभाषा बन सकी थी। फ्रांस में ऐसे 4000 शब्दों की सूची बनाई गई है जो उनकी भाषा में जबर्दस्ती घुस गए थे। एक विधेयक पारित कर इन शब्दों के फ्रेंच में इस्तेमाल रोकने का आदेश दिया गया।

मेरा स्वयं का अनुभव है कि फ्रांसवासियों में स्व-भाषा के प्रति जबरदस्त आदर है। वे अपनी भाषा को अंग्रेंजी से बेहतर मानते हैं। नीदरलैंड में अंग्रेजी हटाने के लिए एक आंदोलन हुआ क्योंकि उनके अनुसार डच भाषा व संस्कृति को इससे खतरा है। चीन, जापान, कोरिया और वियतनाम में सरकारी फरमान या आदेश अंग्रेजी में आने पर जनता तीव्र विरोध प्रकट करती है। जापानी भाषा दुनिया की सबसे कलिष्ट है। उसकी लिपि में 5000 से अधिक चिन्ह हैं। लेकिन उसके बावजूद वे हर कार्य अपनी भाषा में ही करना पसंद करते हैं।

अंग्रेजी के बिना ही जापान ने जबरदस्त उन्नति की है। उसके इलैक्ट्रोनिक सामान व उपकरण बनाने में विश्व में सर्वोच्च स्थान प्राप्त देश है जिसके माल की खपत हर जगह है। यही दशा चीन की भी है, जो आज सारी दुनिया के बाजारों पर कब्जा जमा रहा है। अनेक देशों जिनमें लीबिया, ईराक व बांग्लादेश शामिल है ने एक झटके में अंग्रेजी को निकाल बाहर कर दिया।

कर्नल गद्दाफी ने तो सेना को छह मास में अंग्रेजी हटाने का आदेश दे दिया। ईराक के पिछले शासक ने तो यहाँ तक कह दिया था कि जिसे अंग्रेजी पढ़नी हो वे ईराक छोड़ दें। बांग्लादेश ने ईसाई मिशनरी के संदर्भ में कहा कि इनकी अंग्रेजी से हमारी बंगाली भाषा को खतरा है। माओत्से तुंग ने सत्ता पर काबिज होते ही पूरे चीन में एक ही चीनी भाषा लागू कर दी, जबकि पहले वहां भी 6-7 क्षेत्रीय भाषाएं थी। एक चीनी भाषा होने के कारण भाषायी एकता होने से सभी चीनी स्वयं को एक सूत्र में जुड़े अनुभव करते हैं। स्पष्ट है कि अंग्रेजी कोई सर्वसम्मत अंतर्राष्ट्रीय भाषा नहीं है, जैसा कि हम समझते हैं। यह भी सभी को ज्ञात है कि अंग्रेजी वैज्ञानिक भाषा भी नहीं है। स्वयं अंग्रेज साहित्यकार बर्नाड शा इसे अराजक भाषा घोषित कर चुके हैं क्योंकि हर ध्वनि के लिए कोई तयशुदा शब्द नहीं है। इसके विपरित हिन्दी पूर्णतः वैज्ञानिक भाषा है। विदेशी भाषा की गुलामी अनावश्यक है। जो लोग यह तर्क देते है कि बेहतर क्षमता के लिए अंग्रेजी आवश्यक है उन्हें कौन समझाये कि तमिलनाडु में तीन मुख्यमंत्री सर्वश्री कामराज, एम.जी.रामचंद्रन व करूणनिधि को अंग्रेंजी का ज्ञान नहीं था तो भी उनका काल किसी भी तरह से कमतर नहीं कहा जा सकता।

कुछ लोग अंग्रेंजी को बनाये रखने के लिए क्षेत्रीय भाषाओं को हिन्दी से लड़ाने की कोशिश कर रहे हैं जबकि तथ्य यह है कि दोनों एक दूसरे की पूरक है। यदि क्षेत्रीय भाषाओं को खतरा है तो विदेशी भाषा से है। राष्ट्रभाषा सम्पूर्ण राष्ट्र के हृदयों को जोड़ती है। सम्पर्क भाषा बनकर आपसी संबंध सुदृढ़ बनाती है। हिंदी पूरे भारत की भाषा है। वह साहित्य की जननी, सभ्यता की पोषिका एवं संस्कृति की प्रेरणा है। श्री गोपालसिंह नेपाली ने एक जगह कहा है - हिंदी में गुजराती का संजीवन है, मराठी का चुहल (विनोद) है, कन्नड का माधुर्य है एवं है संस्कृत का अजस्र स्रोत। प्राकृत ने इसका श्रृंगार किया है और उर्दू ने इसके हाथों में मेंहदी लगाई है। यह आर्यों के स्वरों में गाती है और अनार्यों के ताल पर नाचती है। हिंदी राष्ट्रभाषा है। वस्तुतः हिंदी एक परंपरा का नाम है, एक सततवाहिनी सरिता का नाम है, जिसमें असंख्य नद-नालों की अंजलियां समर्पित होती रहती हैं, जिसमें पूरे भारत के प्राण तरंगित होते रहते हैं।' हिन्दी को सबसे ज्यादा प्रोत्साहन अहिन्दीभाषियों ने दिया। 1918 में बंगाली लेखक नलिनी मोहन सान्याल ने लंदन विश्वविद्यालय में हिन्दी में शोध् ग्रंथ प्रस्तुत किया। ब्रह्म समाज के नेता बंगला-भाषी केशवचंद्र सेन से लेकर गुजराती भाषा-भाषी स्वामी दयानंद सरस्वती ने जनता के बीच जाने के लिए जन-भाषा हिन्दी सीखने का आग्रह किया। गुजराती भाषी महात्मा गांधी, मराठी-भाषी काका कालेलकर ने सारे भारत में घूम-घूमकर हिन्दी का प्रचार-प्रसार किया।

नेताजी सुभाषचंद्र बोस की आजाद हिन्द फौज की भाषा हिन्दी ही थी। महर्षि अरविंद घोष हिन्दी-प्रचार को स्वाधीनता-संग्राम का एक अंग मानते थे। न्यायमूर्ति श्री शारदाचरण मित्र कहा करते थे- यद्यपि मैं बंगाली हूं तथापि इस वृद्धावस्था में मेरे लिए वह गौरव का दिन होगा जिस दिन मैं सारे भारतवासियों के साथ हिन्दी में वार्तालाप करूंगा।' बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय और ईश्वरचंद्र विद्यासागर ने भी हिन्दी का समर्थन किया था। आज भी तमिलनाडू निवासी डॉ. बालशौरि रेड्डी से पंजाब के डॉ. हरमहेन्द्र सिह बेदी तक, जम्मू-कश्मीर के डॉ. चमनलाल सप्रू से शिलांग के अकेला भाई तक साहित्य के माध्यम से हिन्दी सेवा में सक्रिय है। वर्धा में स्थापित महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय जिसके वर्तमान कुलपति डा.गोपीनाथन मलयालम भाषी है, इस दिशा में बहुत महत्वपूर्ण कार्य कर रहा है। दुनिया के पचास से अधिक देशों हिन्दी में पठन-पाठन की सुविधा है। अनेक देश हिंदी कार्यक्रम प्रसारित कर रहे हैं, जिनमें बीबीसी, यूएई क़े हम एफ-एम, जर्मनी के डॉयचे वेले, जापान के एनएचके वर्ल्ड और चीन के चाइना रेडियो इंटरनेशनल की हिंदी सेवा विशेष रूप से उल्लेखनीय है। हिन्दी की वर्तमान दशा के लिए हमारी शिक्षा पद्धति और शासन व्यवस्था-दोनों जिम्मेदार हैं।

अगर देश पर हावी अंग्रेजियत को हटाना है तो शिक्षा पद्धति में आमूलचूल परिवर्तन लाना होगा। पहली से लेकर 10 कक्षा तक की शिक्षा से भारतीय भाषाओं का प्रयोग अनिवार्य करना होगा। विज्ञान, भूगोल आदि की पढ़ाई मातृभाषा में ही कराने का प्रावधान करना होगा। उसके बाद भी अंग्रेजी को एक अतिरिक्त विषय के रूप में पढ़ाया जाना चाहिए। जब एक व्यक्ति अपनी भाषा में प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त करेगा, तो उस भाषा के प्रति उसका मोह और सम्मान आजीवन बना रहेगा। हिन्दी की मौजूदा स्थिति के लिए प्रशासन भी कम दोषी नहीं है। संसद से लेकर निम्न पदों तक सभी कार्य अंग्रेजी भाषा में किये जाते हैं। क्या संसद में हिन्दी भाषा में काम-काज नहीं यिका जा सकता? तर्क दिया जाता है कि सभी लोग हिन्दी नहीं जानते। क्या कभी उनसे पूछा गया है कि सभी लोग अंग्रेजी भी नहीं जानते।

अंग्रेजी जानने वालों का प्रतिशत हिन्दी भाषा जानने वालों से बेहद कम है, इस तथ्य को जानने के बाद भी मातृभाषा में काम क्यों नहीं किया जाता? अगर समस्या तेलुगू, बंगाली या अन्य क्षेत्रीय भाषाओं की है तो उनके लिए अनुवादक नियुक्त किये जा सकते हैं। सूचना प्रौद्योगिकी के विकास का इस्तेमाल बखूबी कर सकते हैं। हम भारतीयों को अपनी उस मानसिकता में बदलाव लाना होगा कि हिन्दी जानने वाले व्यक्ति का बौद्धिक स्तर अंग्रेजी भाषा जानने वाले व्यक्ति के बराबर नहीं हो सकता, वह शीर्ष पर नहीं पहुंच सकता। इस तरह की मानसिकता में बदलाव लाने की जिम्मेवारी सिर्फ सरकार की नहीं है। हिन्दी के प्रचार-प्रसार और सम्मान के लिए हम सभी को स्वयं आगे आना होगा। साल में एक बार 'हिन्दी दिवस मनाने जैसे कर्मकाण्ड से ही हिन्दी को वह सम्मान नहीं मिल सकता, जिसकी वह हकदार है। आईए स्वयं से ही शुरूआत करें।

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Regards,
मुकेश कुमार  contact No - 9215959500