Tuesday, 12 November 2013

सत्य दवाई की तरह होता है, रोज घूँट घूँट पिलाना चाहिये,

कल दिल्ली में भूकंप के झटके आने के कारण मै रात भर सो ना सका । सुबह ४ बजे सो पाया ।
शायद ३-४ बार झटके आये होंगे पर मै दो बार नीचे गया । मेरे मोहल्ले के सारे के सारे लोग सो रहे थे, बस इक्का दुक्का लोग मेरे जैसे नीचे आ गये थे ।

मेरे मन में एक ही सवाल था २-३ झटको के बाद भी मेरे मोहल्ले के लोग जागे ना कोई कुत्ता बिल्ली । बस मै ही अकेला नीचे खडा था । चूँकि मै "सत्य" जान चुका था इसलिये घर के अंदर जा नही सकता था और बाकी लोग जो अज्ञानवश सोये हुये थे वो सब अज्ञानतावश सो रहे थे ।

एक पल के लिये ऐसा लगा की मै "सत्य" का झंडा लेकर अकेला खडा हूँ । और जो शायद राजीव दीक्षित और बाकि क्रांतिकारीयों को महसूस करते है वही मैने महसूस किया । अगर आपको सत्य पता होता है तो आप चाहकर भी अपने दायित्व से दूर नही जा सकते ।  एक बार मैट्रीक्स से बाहर आने के बाद आप बाकि लोगो को भी बाहर निकालने के कार्य में लग जाते हो ।

लेकिन आपको ये जानना चाहिये कि अज्ञान के अंधकार में फँसे लोगो को एक दिन में सत्य बताकर बाहर नही निकाल सकते है, सत्य दवाई की तरह होता है, रोज घूँट घूँट पिलाना चाहिये, सारी बोतल एक साथ पिलाने का फायदा नही होता है । अगर आपको सत्य का पता लग जाता है तो आप सत्य को पकड लो । लोग धीरे धीरे जागेंगे । मतांतर या जागरण की क्रिया बहुत धीरे धीरे होती है

नरेन्द्र सिसोदिया

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│  नरेन्द्र सिसोदिया
│  स्वदेशी प्रचारक, नई दिल्ली
│  http://narendrasisodiya.com
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