Saturday, 30 August 2014

क्या स्त्री पुरूष बराबर है?

अक्सर ऐसा देखा गया है की आजकल के आधुनिक या यूँ कहे पश्चिम का अंधानुुकरण करने वाले लोग इस बात पर बडा जोर देते है की स्त्री को पुरूष की बराबरी पर आना चाहिये । दुःख की बात तो ये है की ऐसी बातों में महीलायँ आगे रहती है । क्योंकी मेरे हिसाब ऐसा बोलकर स्त्री समाज अपना खुद का अपमान करती है ।

सबसे पहली बात तो ये की खुद भगवान ने दोनो को अलग बनाया तो दोनो एक कैसे हो सकते है । स्त्री का मानसिक विकास, शारीरिक विकास , गुणों का विकास और सामाजिक ताने बाने में उनकी उपस्थिति पुरूषों से अलग है,
इतने सारे स्तरों पर भिन्नता होने के कारण वो पुरूष के बराबर तो क्या आसपास भी नही है।  इसी बात को मुंशी प्रेमचंद ने इस प्रकार कहा है की - मानवीय गुणों के क्रमिक विकास में स्त्री पुरूषों से कही आगे है । हमारे समाज में स्त्री का अपनी महत्ता है और पुरूषों की अपनी,
इस मामले में किसी को आगे बोलना और किसी को पीछे कहना वैसी ही मूर्खता है जैसी कोई ये बोले की १ लीटर दूध में और  सूरज के प्रकाश में कौन आगे और कौन पीछे ।  पुरूष को जन्म देनी वाली औरत पुरूष से पीछे कैसे हो सकती है ।

मुकाबला समान स्तर पर होता है । अगर आपके सामने कोई ये बोल रहा है की स्त्री और पुरूष को बराबर होना चाहिये तो निसंदेह ही यह कहने की कोशिश कर रहा है की स्त्री पिछडा गई है अौर मर्द आगे है । बराबरीं की बातें करने का मतलब है किसी ना किसी को आगे रखना और किसी ना किसी को पीछे रखने जैसा है । किसी कंपनी में सेल्ल वालो का अपना महत्व है , मार्केटिंग का अपना महत्व है टेक टीम का अपना महत्व है, लेकिन हम ये नही बोल सकते है की सब बराबर होने चाहिये ।

आज भी घर का खर्चा कहाँ चलाना है वो स्त्री ही देखती है चाहे वो दिल्ली की हो या किसी ग्रामीण इलाके की । कोई भी त्योहार या फिर कोई धार्मिक काम, घर को सजाना हो या फिर माँ बन कर घर का निर्णयकर्ता बन जाना हो, सभी कामों में स्त्री ही मुख्य केंद्र है । यहाँ तक की मेट्रों की सीट हो या भारत का कानून हो या सरकारी नौकरीयाँ, सब जगह बराबरी से जितना मिलना चाहिये  उससे ज्यादा ही दिया गया है । भारत के बहुत सारे मंदिर है जहाँ बिना शादी के कोई पुरूष प्रवेश नही कर सकता है कारण पूछने पर वहाँ के पंडित साफ साफ एक ही वाक्य बोलते है की हमारे शास्त्रों में लिखा है की स्त्री के बिना पुरूष अपूर्ण और अशुद्द है, इसलिये हम अविवाहित पुरूषों को प्रवेश नही देते है । शादी के बाद जोडे से बिठाने की परंपरा तो हमेशा से ही रही है । आज के शहर के कूलडूड भी  आपको बोलते मिल जाते है की - "कर लो भाई जितनी ऐश जब तक शादी ना हो"। उनके इस वाक्य में स्त्रीयों के प्रति सम्मान साफ दिखलाई देता है की उसके आने पर बडे परिवर्तन होंगे और वो ये चीज मान कर चलता है ।

आपको जानकर आश्चर्य होगा की भारतीय दर्शनशास्त्र में प्रकृति को भी दो हिस्सों में बाँटा गया है, पुरूष प्रकृति  और स्त्री प्रकृति । गीता और अन्य जगह पर धर्म शब्द किसी पूजा पाठ की पद्धति से नही जोडा गया है, भारत में धर्म शब्द तो राम और कृष्ण के भी पहले भी था और धर्म पर बोलते हुये कृष्ण ने बोला है की धर्म के १० गुण होते है । जैसे क्षमा, करूणा, बुद्धि आदी स्त्रीलिंग शब्द है । वही अधर्म शब्द के गुण जैसे क्रोध,लोभ आदी पुर्लिंग शब्द है। नदियों का माता कहना और उनके स्त्रीसूचक शब्द इसी बात की ओर इशारा करते है की भारतीय समाज में स्त्रीयों का विशेष महत्व रहा है । हाँ समय से साथ थोडा कम ज्यादा हो गया है । मुझे तो यह लगता है की धर्म, संस्कृति और धर्म के स्त्रीसूचक गुणों का निर्माण पुरूषों द्वारा बनाना संभव ही नही है, ये सारी चीजे और व्यवस्था भारत में पुरातन स्त्रीयों के द्वारा ही बनाई गई है और इस बात पर अच्छी खासी रीसर्च (अनुसंधान) की आवश्यकता है।  और तो और हमने तो भारत को, जो की पुरूष सूचक शब्द है, के आगे भी माता लगाकर पूरे विश्व के सामने अनूठा उदाहरण प्रस्तुत किया है । आपको समाचार मे ये सुनने को मिल जायेगा कि कुछ लोगो ने मिलकर किसी औरत का बलात्कार किया लेकिन ये कभी सुनने को नही मिलेगा की कुछ औरतों ने मिलकर पुरूष का बलात्कार किया । ऐसा इसलिये की भारतीय स्त्रीयों में अभी भी अपनी संस्कृति के प्रति श्रद्धा है और उनके स्वभाव में अपने आप ही धर्म के गुण विद्ववान होते है ।


क्या आपको अभी भी लगता है की भारत में हमेशा स्त्रीयों को हर काम में पीछे रखा गया है ?

हाँ मै मानता हूँ बहुत जगह पर स्त्रीयों के साथ बहुत गलत व्यवहार  होता है और वहाँ बदलाव जरूरी है । समय समय पर समाज में कुरीतीयों ने जन्म लिया और वो आज खत्म हो गई । आज जो कुरीतियाँ है वो कल खत्म हो जायेंगी । लेकिन इसका ये मतलब नही की हम ये मान के चल बैठे की स्त्री पीछे रह गई और उसे भागकर पुरूषों के बराबर आना चाहिये ।

बराबरी का जो अभियान है वो विदेशी देन है, ये कन्सेप्ट (अवधारणा) बाहर के देश से आया है । जहाँ से ये अभियान आया है वहाँ पर स्त्रीयों की दुर्दशा बेहद खराब है । मात्र ६० साल पहले तक वहाँ कानूनन वोट डालना हो या बैंक में खाता खुलवाना हो, इस तरह कामों में स्त्रीयों कोई अधिकार प्राप्त नही था । आपने जिन तथाकथित महान(?) विदेशी दार्शनिक लोगो का बस नाम सुन रखा है उनके साहित्य अंदर तक पडोगे तो आपको पता लगेगा की कही किसी ने लिखा है की "स्त्री मात्र भोग(मजे) की वस्तु है", तो कही किसी ने लिखा है की "स्त्री के अंदर आत्मा नही होती है जैसे अन्य जानवर जैसे की कुत्ता बिल्ली"। सिगमंड फ्राईड ने तो ये तक बोल दिया की बच्चे के अंदर सेक्स भावना रहती है वो माँ का दूध पीते समय दिख जाती है। अरस्तु से लेकिन जितने भी दार्शनिक और विचारक पैदा हुये उन सबसे विचार औरतों के प्रति ठीक नही थे ।
दा विंची मूवी में बताया गया है की मात्र २००० सालो में ईसाई धर्म शून्य से पूरे संसार में जनसंख्या के मामले में पहले स्थान पर आ गया और इस विश्व विजय में करोडो औरतों को डायन बोल कर जिंदा जला दिया गया । आज भी इस्लामिक देश जहाँ सरीया कानून लागु है वहाँ पर स्त्रीयों की स्थिती बहुत निंदनीय है। दूर क्युँ जाते है, आजाद भारत का शाहबानो केस ही देख लेते है । शाहबानों ५० साल की औरत थी जो तलाक के बाद अपने शौहर से गुजारा भत्ता माँगने कानून तक पहुँच गई । कोर्ट ने फैसला जो सुनाया वो भारतीय कानून के हिसाब से ठीक था लेकिन शरीया कानून मानने वाले ने पूरे देश में इसे बहुत बडा मुद्दा बना दिया । संगठित मुस्लिम शक्ति ने अपना प्रभाव दिखाते हुये भारतीय  कानून में ही संशोधन करवा दिया । दुबई में शरीया कानून होने की वजह से कई विदेशी महिलाओं को बलात्कार के बाद न्याय नही मिलता है | इरानी महीला अतेफाह (Atefah_Sahaaleh) को १४ से १६ साल की उम्र में ५१ साल का एक बंदा बलात्कार करता रहा । शरीया अदालत में जब अतेफाह को लगा की वो अपना केस हार रही है तो उसने अपनी बात जोर से रखने के लिये अपने चेहरे से हिजाब उतार दिया । इस बात पर अदालत ने अतेफाह को फाँसी की सजा दे डाली ।

अगर आपके पास भारत को बदनाम करने के नाम पर २-३ कुरीतियों है तो मेरे पास तो हजारों जीवीत प्रमाण है  विदेशी संस्कृतीयों के नाम पर। इशारा बस एक ही तरफ है की भारतीय समाज में महीलाओं की स्थिती पहले और आज हमेशा ही अच्छी रही है । अगर महिला बराबरी की बात और अभियान का तुक बनता है तो वो मात्र विदेशी में बनता है, लेकिन भारत में नही । दुःख की बात तो ये है की इसी बराबरी के नाम विदेश में ५० साल पहले फेमिनिज्म नाम के अभीयान को चलाया गया और इसका परिणाम यह रहा की स्त्रीयों ने पुरूषों के कंधे से कंधे मिला कर शराब, सिगरेट और आदि बुराईयाँ अपना ली है । बराबरी के फेमिनिज्म ने क्या बर्बादी की वो इंटरनेट पर आसानी ने पढने को मिल जायेगी ।

अगर जरूरत है तो पुरूषों को स्त्री गुणों को अपनाने की जरूरत है ना की स्त्रीयों को मर्द की तरह बनने की । दोनो के अपने अपने अधिकार है और दोनो के अपने अपने कृतर्व्य । जब तक हमारे समाज में स्त्रीयों ने मन में ये बात रहेगी की वो पीछे है तब तक उनके मन में स्वाभीमान नही आ सकता और तब तक उनके मन के किसी ना किसी कोने में हीन भावना रहेगी ही रहेगी और तब तक धीरे धीरे स्त्री समाज अपनी खुद की पहचान खोकर पुरूष समाज का अंधानुकरण करेगी ही करेगी ।  ये अंधानुकरण ठीक वैसा ही है जैसे आज का भारतीय युवक ५०० सालों की लूट के दम मात्र १५० साल की तरक्की को देख कर मन से गुलाम होकर अपने को पीछे समझने लगा है और हर चीज में विदेशी अंधानुकरण करने लग गया है । बदलाव की जरूरत तो हमेशा ही हर समाज को रहती है लेकिन इस बात पर नही की कोई समाज अपनी पहचान ही मिटा दे और अपने को हीन समझे ।

जिस प्रकार आपके घर में गंदगी हो आप सरकार का इंतजार नही करते, आप खुद ही साफ करने जुट जाओगे । ठीक उसी प्रकार से भारतीय स्त्री समाज को अपने पीछे नही समझना चाहिये और ये तो बोलना ही नहीं चाहिये की बराबरी पर आना है । आप लोग तो वैसी ही आगे हो । जरूरत है तो बस आपको जो गलत लगे उसके खिलाफ आवाज उठाने की, भेडचाल चलने की नही ।

मै खुद एक लडका हूँ इसलिये इस मुद्दे पर लिखने का अधिकार नही है, लेकिन मै अपने को रोक नहीं सका क्युँकि जिनको ये लेख लिखना चाहिये वो आगे नही आते या फिर मतिभ्रम में है ।


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Narendra Sisodiya
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Sunday, 24 August 2014

२०१४ का दिल्ली पुस्तक मेले पर मेरी प्रतिक्रिया

पुस्तक मेले जाकर घोर निराशा हुई ।  ऐसा लगा की मैं विदेश के किसी पुस्तक मेले में आ गया हूँ । हर तरफ बस इंगलिस ही इंगलिस  की नोवेल और किताबे थी, हिंदी और संस्कृत की स्टाल गायब थी । पिछले साल के हिसाब से कही ज्यादा इंग्लिस का बोल बाला था ।

संस्कृत के पंसदीदा चौखम्बा प्रकाशन ने तो इस बार स्टाल ही नही लगाई थी। धर्म के मामले में बस गीताप्रेस गोरखपुर ने कमान संभाल रखी थी । इसके अलावा इस्कोन वाले, सहज योग, जैसे ३-४ स्टाल थे जहाँ पकड पकड कर लोगो को उनके "गीता" के वर्जन थमाये जा रहे थे । हद तो ये भी गई की कोई जपानी आध्यात्मिक गुरु की भी बडे जोर शोर से लगाये हुये । जैसे ही मैं मैने जपानी स्टाल देखी तब मुझे यही ख्याल आया की - "मेरे जपानी भाई धर्म आध्यात्म की इस भूमी में तुम हमें अाध्यात्म सिखाने आ गये, आपना तो धर्म भी भारत से गया है", सांइटोलोजी की स्टाल बडे जोर से नये मूर्खो को पकड रही थी वही गौतम बुद्घ प्रकाशन वामपंथी "धर्म अफीम है" और मुद्राराक्षस व अंबेडकर से लेकर दलित साहित्य के नाम पर गुमराह करने का पूरा जोर लगा रही थी । वो तो शुक्र है जी ज्योतिष के लेकर तमाम विज्ञान पंडितो ने किया है वरना वो लोग दलित साहित्य के बाद "दलित विज्ञान" के नाम पर भी काफी चीजो को पेटेंट करवा लेते । साँई करूणा संस्थान हर बार की तरह साँई की अंधभक्ति में लगा हुआ था, जब मैने जाकर पूछा की साँई तो हमेशा सफेद कपडों में थे फिर ये किसी फोटो में भगवा तो किसी में लाल, किसी में हरा, किसी में विष्णु के साथ क्यु लगाया है स्टाल पर तो सामने वाला बंदा भडक गया और जोर जोर से बोलने लगा । आगे कुछ बोलता इसके पहले उसी स्टाल की लेडिस आके मुझे जाने को कहने लगी । अब महीला के कौन मुँह लगे । मै आगे बडा तो कुछ मुसलमानों ने स्टाल लगा रखी थी । कुछ कुरान की आयते और कुछ वेद की श्रुतियों के दम पर - "वेद और कुरान को एक ही है" विचार का बीज नई पीडी के दिमाग में डालने का पूरा प्रयास कर रहे थे । ये कुछ वैसा ही की कोई ये कहे की रावण के २ पैर थे और राम के भी २ पैर थे, इसलिये राम और रावण एक ही तो है । वही पर कुछ "मुस्लिम विज्ञान साहित्य" भी रहा था । चौकिये मत, ये शब्द मेरे दिमाग में इसलिये आया क्योकी वहाँ रखी ५-६ पेज की एक पुस्तक - "माँसाहार" के लेखक के भरपूर वैज्ञानिक प्रयोगो का हवाला देकर ये बात रखी थी पौधो में भी जान होती है वो भी साँस लेते है, खेती करना भी लाखों मासूम पौधों का कतल है और संसार का हर जीव किसी ना किसी को खाता है तो फिर माँसाहार बुरा नहीं । "कुतर्क" क्या होता है इस बुक को पडने से आराम से पता लग जाता है ।
ये कुछ वैसा ही है की आपने कोई गुंडे का सरदार ये बोले की अपने आसपास एक बंदा बता तो जो झूठ ना बोलता हो, आप झूठ बोलकर पाप ही तो करते है, पाप भी ईश्वर ने बनाया है तो करने में कोई बुराई कैसी़, कोई कम करता है कोई ज्यादा।
ठीक इसी प्रकार आजकल के कूलडूड ये बोलते है की हम सब भष्ट्राचारी है, हम लोग ही ठुल्ले को पैसे देते है बचने के लिये, फिर कांग्रेस ने करोडो का भष्ट्राचार किया तो बुराई क्या है ।
कुतर्क की कोई सीमा नही और स्वविवेक ही इसका हल है।
वैसे आपको बता दूँ की पेडों को बिना हानी पहँचाये हम फल खाते है इसके अलावा पौधे एक इंद्रिय जीव है और हम पाँच इंद्रीय। हम तो माँसाहार को एक घृणित कार्य मानते है और मानते रहेंगे , बाकी आपकी अपनी श्रद्धा

खैर आगे बडते है नोबल के संसार में । कम से कम ६ से १० स्टाल ओर १०० रू की तीन , हर माल ५० रू के बोर्ड लगे थे । इन बुक की स्टाल देखकर सरोजीनी की स्टाल याद आ गई जहाँ हर माल १०० रू का बोर्ड लगा होता है और सारी जनता टूट जाती है |
इंग्लिस के मोटे मोटे नोवल्स का तो अंबार लगा था । कमी थी तो बस हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं की । वैसे मै नोवल्स पडता भी नहीं हूँ ।
राजीव दीक्षिज जी की स्टाल ने ही क्रांतिकारी साहित्य का खेमा थाम रखा था वही अधिकांश हिंदी स्टाल पर अंग्रेजी किताबो का हिंदी अनुवाद था , जैसे "लोक व्यवहार, गरीब बाप- अमीर बाप" और इसी तरह कि अन्य फालतु जोश जगाने वाली विदेशी किताबे जो अस्थायी तौर पर जोश तो जगा सकती है लेकिन भारतीय स्वाभीमान जगाने की बजाय उसे और घटा ही देगी । मानसिक गुलामों की बडी भीड का सामना करते करते थकावट सी हो जाती है ।
मुझे आज तक समझ नही आता की विद्यार्थी "रीच डैड, लोक व्यवहार, सफल लोगो को ७ आदते" जैसी फालतु किताबे छोडकर सुरेश सोनी की "भारत अतीत वर्तमान" और "भारत का वैज्ञानिक चिन्तन" जैसी किताबे अगर पड ले तो उनके अंदर इतना आत्म विश्वास आ सकता है की वो कोई भी काम कर ले ।
पहले ऐसी पुस्कते मिल जाती थी लेकिन अब पुस्तक मेले में इस प्रकार की किताबे मिलना बहुत मुश्किल है ।
काफी ज्यादा स्टाल बच्चो की सीडी डीवीडी बेच रहे थे । उन स्टालो में एलसीडी पर अंग्रेजी पोयम्स जैसे, टिंकल टिंकल लीटील स्टार, पूसी पूसी कैट वेयर यु बीन आई बीन टू लंडन टू सी द क्वीन, लंडन ब्रिज फालिंग जैसी कवितायें  बज रही थी।   बच्चे झूम रहे थे । मानसिक गुलामी की कडीयाँ और मजबूत हो रही थी । एक स्टाल पर हिंदी पोयम बज रही थी तो थोडा सूकन आया ।

भारत किस ओर जा रहा है ये साफ दिख रहा था पुस्तक मेले में और मुझे इसे किसी ओर दिशा में मोडने के लिये क्या करना पडेगा इसकी साफ प्रेरणा भी मिल रही थी ।





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Narendra Sisodiya
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Friday, 8 August 2014

त्रीसूत्रीय माँग में लिये भारत में बहुत बडे आंदोलन की आवाश्यकता है

हम भारत को भारतीयता के आधार पर खडा करना चाहते है ।
 
इस राजनीती से भारत बदल सकता है या नही ये देखने के लिये हमको तीन माँगें रखनी चाहिये ।

ये है तीन माँगे ।
१) एक देश एक नाम - इंडिया शब्द को अाधिकारीक तौर पर पूर्ण बहिस्कार, केवल और केवल भारत शब्द का उपयोग ।
२) शराबबंदी - भारत से पूर्ण रूप से शराब बंद, जो घाटा हो होने दो, भाड में जाये राजस्व और भाड में जाये शराब से पैसे के राजस्व से किया गया विकास
३) गौहत्या बंदी - भारत में चल रहे गौवंश (गाय - बैल आदि) के सारे कतलखानो को पूरी तरह से बंद और गौहत्या को कानूनन जघन्य अपराध घोषित किया जाये ।
 

अगर हम इन तीन बातों को मोदी सरकार से मनवा लेते है तो सही है, लेकिन अगर पूर्ण बहुमत वाली मोदी सरकार नही मानती है तो समझ लिजिये दूसरा कोई प्रधानमंत्री ये काम नही कर सकता है और नाही हमारी माँगो का रास्ता राजनीती से जाता है ।
ना मानने की स्तिथि में हमारे पास मात्र ३ ही विकल्प ही बच जाते है ।
१) हिंसक क्रांति से भारत की पूरी व्यवस्था को फिर से नये रूप से प्रारंभ करना और नया संविधान लिखना जो भी भारतीयता और भारतीय संस्कृती के आधार से लिखा गया हो ।
२) भारतीयता को हमेशा के लिये भूल कर अपनी संतानो को वर्ण शंकर या फिर पूर्ण रूपेण अंग्रेज बना कर पूरी तरह से विदेशी संस्कृती को अपना ले
३) भारत के किसी छोटे हिस्से को नया देश घोषित किया और वहाँ हम भारतीयता और भारतीय संस्कृती को जीवीत करें



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Narendra Sisodiya
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