Sunday, 24 August 2014

२०१४ का दिल्ली पुस्तक मेले पर मेरी प्रतिक्रिया

पुस्तक मेले जाकर घोर निराशा हुई ।  ऐसा लगा की मैं विदेश के किसी पुस्तक मेले में आ गया हूँ । हर तरफ बस इंगलिस ही इंगलिस  की नोवेल और किताबे थी, हिंदी और संस्कृत की स्टाल गायब थी । पिछले साल के हिसाब से कही ज्यादा इंग्लिस का बोल बाला था ।

संस्कृत के पंसदीदा चौखम्बा प्रकाशन ने तो इस बार स्टाल ही नही लगाई थी। धर्म के मामले में बस गीताप्रेस गोरखपुर ने कमान संभाल रखी थी । इसके अलावा इस्कोन वाले, सहज योग, जैसे ३-४ स्टाल थे जहाँ पकड पकड कर लोगो को उनके "गीता" के वर्जन थमाये जा रहे थे । हद तो ये भी गई की कोई जपानी आध्यात्मिक गुरु की भी बडे जोर शोर से लगाये हुये । जैसे ही मैं मैने जपानी स्टाल देखी तब मुझे यही ख्याल आया की - "मेरे जपानी भाई धर्म आध्यात्म की इस भूमी में तुम हमें अाध्यात्म सिखाने आ गये, आपना तो धर्म भी भारत से गया है", सांइटोलोजी की स्टाल बडे जोर से नये मूर्खो को पकड रही थी वही गौतम बुद्घ प्रकाशन वामपंथी "धर्म अफीम है" और मुद्राराक्षस व अंबेडकर से लेकर दलित साहित्य के नाम पर गुमराह करने का पूरा जोर लगा रही थी । वो तो शुक्र है जी ज्योतिष के लेकर तमाम विज्ञान पंडितो ने किया है वरना वो लोग दलित साहित्य के बाद "दलित विज्ञान" के नाम पर भी काफी चीजो को पेटेंट करवा लेते । साँई करूणा संस्थान हर बार की तरह साँई की अंधभक्ति में लगा हुआ था, जब मैने जाकर पूछा की साँई तो हमेशा सफेद कपडों में थे फिर ये किसी फोटो में भगवा तो किसी में लाल, किसी में हरा, किसी में विष्णु के साथ क्यु लगाया है स्टाल पर तो सामने वाला बंदा भडक गया और जोर जोर से बोलने लगा । आगे कुछ बोलता इसके पहले उसी स्टाल की लेडिस आके मुझे जाने को कहने लगी । अब महीला के कौन मुँह लगे । मै आगे बडा तो कुछ मुसलमानों ने स्टाल लगा रखी थी । कुछ कुरान की आयते और कुछ वेद की श्रुतियों के दम पर - "वेद और कुरान को एक ही है" विचार का बीज नई पीडी के दिमाग में डालने का पूरा प्रयास कर रहे थे । ये कुछ वैसा ही की कोई ये कहे की रावण के २ पैर थे और राम के भी २ पैर थे, इसलिये राम और रावण एक ही तो है । वही पर कुछ "मुस्लिम विज्ञान साहित्य" भी रहा था । चौकिये मत, ये शब्द मेरे दिमाग में इसलिये आया क्योकी वहाँ रखी ५-६ पेज की एक पुस्तक - "माँसाहार" के लेखक के भरपूर वैज्ञानिक प्रयोगो का हवाला देकर ये बात रखी थी पौधो में भी जान होती है वो भी साँस लेते है, खेती करना भी लाखों मासूम पौधों का कतल है और संसार का हर जीव किसी ना किसी को खाता है तो फिर माँसाहार बुरा नहीं । "कुतर्क" क्या होता है इस बुक को पडने से आराम से पता लग जाता है ।
ये कुछ वैसा ही है की आपने कोई गुंडे का सरदार ये बोले की अपने आसपास एक बंदा बता तो जो झूठ ना बोलता हो, आप झूठ बोलकर पाप ही तो करते है, पाप भी ईश्वर ने बनाया है तो करने में कोई बुराई कैसी़, कोई कम करता है कोई ज्यादा।
ठीक इसी प्रकार आजकल के कूलडूड ये बोलते है की हम सब भष्ट्राचारी है, हम लोग ही ठुल्ले को पैसे देते है बचने के लिये, फिर कांग्रेस ने करोडो का भष्ट्राचार किया तो बुराई क्या है ।
कुतर्क की कोई सीमा नही और स्वविवेक ही इसका हल है।
वैसे आपको बता दूँ की पेडों को बिना हानी पहँचाये हम फल खाते है इसके अलावा पौधे एक इंद्रिय जीव है और हम पाँच इंद्रीय। हम तो माँसाहार को एक घृणित कार्य मानते है और मानते रहेंगे , बाकी आपकी अपनी श्रद्धा

खैर आगे बडते है नोबल के संसार में । कम से कम ६ से १० स्टाल ओर १०० रू की तीन , हर माल ५० रू के बोर्ड लगे थे । इन बुक की स्टाल देखकर सरोजीनी की स्टाल याद आ गई जहाँ हर माल १०० रू का बोर्ड लगा होता है और सारी जनता टूट जाती है |
इंग्लिस के मोटे मोटे नोवल्स का तो अंबार लगा था । कमी थी तो बस हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं की । वैसे मै नोवल्स पडता भी नहीं हूँ ।
राजीव दीक्षिज जी की स्टाल ने ही क्रांतिकारी साहित्य का खेमा थाम रखा था वही अधिकांश हिंदी स्टाल पर अंग्रेजी किताबो का हिंदी अनुवाद था , जैसे "लोक व्यवहार, गरीब बाप- अमीर बाप" और इसी तरह कि अन्य फालतु जोश जगाने वाली विदेशी किताबे जो अस्थायी तौर पर जोश तो जगा सकती है लेकिन भारतीय स्वाभीमान जगाने की बजाय उसे और घटा ही देगी । मानसिक गुलामों की बडी भीड का सामना करते करते थकावट सी हो जाती है ।
मुझे आज तक समझ नही आता की विद्यार्थी "रीच डैड, लोक व्यवहार, सफल लोगो को ७ आदते" जैसी फालतु किताबे छोडकर सुरेश सोनी की "भारत अतीत वर्तमान" और "भारत का वैज्ञानिक चिन्तन" जैसी किताबे अगर पड ले तो उनके अंदर इतना आत्म विश्वास आ सकता है की वो कोई भी काम कर ले ।
पहले ऐसी पुस्कते मिल जाती थी लेकिन अब पुस्तक मेले में इस प्रकार की किताबे मिलना बहुत मुश्किल है ।
काफी ज्यादा स्टाल बच्चो की सीडी डीवीडी बेच रहे थे । उन स्टालो में एलसीडी पर अंग्रेजी पोयम्स जैसे, टिंकल टिंकल लीटील स्टार, पूसी पूसी कैट वेयर यु बीन आई बीन टू लंडन टू सी द क्वीन, लंडन ब्रिज फालिंग जैसी कवितायें  बज रही थी।   बच्चे झूम रहे थे । मानसिक गुलामी की कडीयाँ और मजबूत हो रही थी । एक स्टाल पर हिंदी पोयम बज रही थी तो थोडा सूकन आया ।

भारत किस ओर जा रहा है ये साफ दिख रहा था पुस्तक मेले में और मुझे इसे किसी ओर दिशा में मोडने के लिये क्या करना पडेगा इसकी साफ प्रेरणा भी मिल रही थी ।





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Narendra Sisodiya
UI Architect @
Unicommerce
Delhi - Bharat